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krishna story कंस के अंत की आकाशवाणी

by | Mar 1, 2020 | Krishna Story, Mythology

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krishna story कंस के अंत की आकाशवाणी

krishna story कंस के अंत की आकाशवाणी: यमुना नदी के किनारे एक नगरी बसी हुई थी जिसका नाम था मथुरा।  मथुरा के राजा  का नाम था महाराज उग्रसेन।  राजा उग्रसेन के पांच बेटे थे,  उनमें सबसे बड़ा था कंस।  कंस एकदम राक्षस का ही अवतार लगता था। वह राज्य के सभी लोगों को बहुत परेशान करता। पशु पक्षियों, प्रजा, साधु संत सभी को सताता एवं यहां तक कि देवताओं को भी वह बहुत सताता था। कंस  ने अपने पिता को भी कैद करके उसकी राजगद्दी हत्या ली थी। कंस का अत्याचार दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था। उसके अत्याचार से सभी परेशान थे और बहुत दुखी भी थे।

वैसे तो कंस की कोई भी सगी बहन नहीं थी। परंतु कंस के चाचा देवक  की एक पुत्री थी जिसका नाम  देवकी था। कंस को देवकी अपनी सगी बहन की तरह ही प्रिय थी। और देवकी भी कंस को अपना सगा भाई ही मानती थी।

मथुरा में शूरसेन नाम के एक यादव रहते थे। शूरसेन के बेटे का नाम वासुदेव था। वासुदेव से देवकी का विवाह तय हो गया था।  देवकी और वासुदेव के विवाह की पूरे राज्य में जोर-शोर से तैयारियां चल रही थी। कंस बहुत ही खुश था कि उनकी उसकी बहन की शादी थी।

वासुदेव और देवकी का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ। जब देवकी को विदा करने का वक्त हुआ तो देवकी का भाई कंस ने कहा “कि वासुदेव  और देवकी का रथ तो मैं ही  चला लूंगा। और अपनी बहन को ससुराल में छोड़कर आऊंगा”।

यह सुनकर देवकी और वासुदेव की खुशी की कोई सीमा ना रही। ढोल नगाड़े बजने लगे राजपुरोहित ने मंत्रों का उच्चारण शुरू कर दिया। कंस ने सारथी की जगह ले ली और रथ को आगे बढ़ाया। रथ के पहिए आगे बढ़ने लगे।

तभी आसमान मैं  बादल गरजने लगे, बिजली चमकने लगी, आवाज सुनाई देने लगी।

“ हे कंस………. “।

आसमान से आती हुई अपने नाम की ध्वनि को सुनकर कंस बहुत हैरान हो गया।

आसमान से फिर आवाज आई

“हे कंस………. ।

तेरे पापों का घड़ा भर गया है…. अब तेरा अंत होगा।

हे कंस…… इस बहन को तू इतने प्यार से विदा कर रहा है उसी की आठवीं संतान तेरा वध करेगी तेरा अंत होगा”।

यह सुनते के साथ ही कंस का गुस्सा एकदम से भड़क गया। उसने दौड़ते हुए घोड़ों  लगाकर उन्हें रोक दिया रुक गया। आपकी आंखें गुस्से के कारण और बड़ी-बड़ी दिखने लगी जैसे उसकी आंखों से अंगारे निकल रहे हो। कंस   रथ  नीचे कूद गया। उसका चेहरा गुस्से से एकदम लाल हो गया था। उसने गुस्सा से देवकी की तरफ देखा और देवकी को मारने के लिए तलवार निकाल ली।  कंस का यह रूप देखकर वासुदेव बहुत ही घबरा गए और वह बीच-बचाव करते हुए बोले। “चिंता क्यों कर रहे हैं अभी तो हमारी शादी हुई है। अभी तो आपकी बहन ससुराल भी नहीं पहुंची है।  आप दोनों भाई-बहन साथ खेले हैं। साथ पढ़े हैं। और एक भाई का फर्ज बहन की रक्षा करना होता है ना कि उसकी जान लेना फिर आप कैसे ले सकते हैं”।

“अपनी बहन को छोड़ दीजिए हम पर दया कीजिए”।

वासुदेव की बातें सुनकर कंस जोर से हंसने लगा और कहने लगा। “यहां सवाल भाई-बहन के प्रेम का नहीं है। या सवाल मेरी मृत्यु का है। और अगर मैं देवकी को हि मार दूंगा तो उसकी संतान जन्म कैसे लेंगी इसलिए ना तो यह रहेगी और ना ही इसकी संतान”।

कंस देवकी को मारने ही वाला था, तभी वासुदेव ने एक बार फिर कहा “कि आप की मृत्यु का कारण तो देवकी कि संतान होगी ना मैं वचन देता हूं कि जैसे ही हमारी कोई भी संतान होगी हम उसे आप को सौंप देंगे उस संतान के साथ आप चाहे कुछ भी करें।  इस तरीके से आपको अपनी मृत्यु का भय भी नहीं रहेगा और आप की देवकी जीवित रहेगी“।

वासुदेव की बातें सुनकर कंस को थोड़ा सकुन मिला और कंस ने कह “वासुदेव तुम्हारे कहने पर मैं देवकी को छोड़ दे देता हूं लेकिन अपने वचन को तुम निभाना और जैसे ही तुम्हारी कोई भी संतान हो उसे मुझे सौंप देना । ऐसा कहकर कंस ने “देवकी और वासुदेव को छोड़ दिया”।

देवकी और वासुदेव अपने घर चले गए।,  परंतु यह क्या कंस बार-बार वही आकाशवाणी याद आ रही थी।

“कि देवकी की आठवीं संतान ही तेरा अंत करेगी”।

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इसके अलावा अकबर बीरबल की और कहानियां पढ़ने के लिए  यहां क्लिक करें Krishna Story in Hindi

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