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Akbar Birbal Story In Hindi | जादुई गधा

by | Feb 22, 2020 | Akbar Birbal Story In Hindi

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जादुई गधा ~ अकबर और बीरबल की कहानियाँ | Akbar Birbal Story In Hindi

Akbar Birbal Story In Hindi | जादुई गधा: एक बार की बात है शहंशाह अकबर ने अपनी रानी को कीमती तोहफा देने की  सोची। इसीलिए बादशाह अकबर ने राज्य के सबसे अच्छे  ज्वाराहात के कारीगरों को बुलाया और उनसे महारानी के लिए एक बेशकीमती हार बनाने का बनाने को कहा। कारीगरों ने जब हार बताया तो वह बहुत ही खूबसूरत था और एकदम बेशकीमती भी क्योंकि उसमें काफी  सारे महंगे और बड़े बड़े हीरे लगे थे। बादशाह अकबर ने व्यवहार तोहफे में रानी को दिया तो रानी उस बेशकीमती हार को देखकर बहुत ही ज्यादा खुश हो गई।

बादशाह अकबर  ने कहा  –   “रानी साहिबा यह लीजिए हमारी तरफ से आपके लिए एक छोटा सा तोहफा।”

रानी  ने कहा –  “अरे वाह यह तो बहुत ही खूबसूरत है और बेशकीमती भी मेरे पास तो ऐसा एक भी हार नहीं है यह मुझे बहुत ही पसंद आया।”

बादशाह अकबर  ने कहा  – “हाँ रानी  साहिबा खूबसूरत  क्यों नहीं होगा। मैंने इसे  जीके सबसे खास कारीगरों से  जो बनबाया है।  वह भी खास आपके लिए।”

रानी  ने कहा –   “मुझे यह हार बहुत ही ज्यादा पसंद आया महाराज।  मैं हमेशा  इसे अपने पास ही  रखूंगी, इसे अपने से दूर कभी नहीं होने दूंगी मैं बहुत खुश हूं जो मुझे आपने इतना अच्छा बेशकीमती हार तोहफे में दिया।”

अकबर ने कहा– “हम भी बहुत  खुश है कि आप को  हमारा दिया हुआ तोहफा इतना पसंद आया। आप जब भी इसे पहनेंगी तो आपको इसमें हमारा प्यार ही नजर आएगा।”

रानी ने कहा – “शुक्रिया  महाराज।”

फिर  अगले दिन जब रानी सुबह सोकर उठती है और नहा धोकर तैयार होती है तो वह देखती है कि उन्होंने जहां पर  रानी ने अपना  हार रखा था,    वह  वहां नहीं है !  यह देखकर रानी बहुत ही दुखी हो जाती हैं।

रानी हर जगह खोजती है लेकिन उसे हार कभी नहीं मिलता। तब रानी  दासियों को बुलाती हैं और बताती है कि “मेरा हार खो गया है। क्या किसी ने देखा है यहां पर, रात को सोने से पहले यहीं पर रखा था मैंने, लेकिन अब वह वहां नही है।”

दासी  रानी से कहती है  – “महारानी जी आप कोई दूसरा  और हार पहन लीजिये, आपके पास तो बहुत सारे हार हैं।”

रानी  ने कहा – “नही, नही यह बिल्कुल नहीं हो सकता !  महाराज ने वह हार हमें बहुत ही प्यार से दिया है और हमें वह बहुत प्रिय भी है हमें तो सिर्फ वही  हार  चाहिए है हमें कोई और हार नहीं चाहिए।”

यह बात कह कर  रानी उदास हो कर बैठ जाती हैं, तभी कुछ ही देर में  वहाँ बादशाह अकबर आते हैं –

बादशाह अकबर  महारानी से पूछते हैं  – “क्या हुआ आपको, आप इतनी  मायूस क्यों बैठी हैं?”

रानी बताती है –  “महाराज वह जो हार आपने हमें तोहफे में दिया था ना, वह कहीं खो गया है। हमने सोने से पहले यही रखा था, लेकिन जब आप सो के उठे हैं तो वह यहां पर नहीं है।”

अकबर – “खो गया है, से क्या मतलब आपका ? कहना क्या चाहती है आप ! कहीं आपने मेरा दिया हुआ तोहफा गिरा तो नहीं दिया?”

रानी ने कहा –  “नहीं नहीं   महाराज हम  सच कह रहे हैं, रात को सोने से पहले हमने उसे यही उतार कर रखा था, ना जाने वह कहां चला गया। हमें माफ कर  दीजिए महाराज हम आपके तोहफे को संभाल कर नहीं रख पाए।” और रानी जोर जोर से रोने लगती है।

अकबर – “अरे नहीं नहीं महारानी जी, आप रोइए मत वह तो बस एक मामूली सा तोहफा था। हम आपके लिए उससे भी अच्छा और उससे भी ज्यादा खूबसूरत एक और हार बनवा देंगे। और हम आपसे वादा करते हैं कि हम आपको वह वाला हार भी ढूंढ कर देंगे। बस आप परेशान ना हो शांत हो जाइए , आज आप हमारे ही कमरे में ठहर जाइए।”

ऐसा कहकर  बादशाह अकबर अपने सिपाही को भेजते हैं और कहते हैं “तुम और  बाकी सभी दास, दासियों  और सिपाहियों को लेकर जाओ और हार को रानी के कमरे में हर जगह ढूंढो।”

तब सिपाही घबरा के के कहता है “जहांपनाह महल के दूसरे हिस्सों में भी काफी चोरियां हो चुकी है हम सभी ने चोर को पकड़ने की खूब कोशिश की लेकिन हम सफल नहीं हो पाए।”

यह सुनकर बादशाह अकबर को बहुत ही हैरानी होती है और वह गुस्से से भर कर कहते हैं  “क्या महल के दूसरे हिस्सों में भी चोरियां हो चुकी है ! ऐसा कैसे हो सकता है अब तक हमें यह खबर क्यों नहीं दी गई है ? अब जाओ और पहले महारानी के कमरे में हार को ढूंढो अगर आर नहीं मिलेगा, फिर कुछ सोचेंगे।”

कुछ ही देर में सिपाही वापस आता है, और बताता है “महाराज हमने हार  हो सभी जगह बहुत ढूंढा लेकिन महारानी जी का हार हमें कहीं भी नहीं मिला।”

अब बादशाह अकबर को बहुत ही गुस्सा आता है और वह सिपाही को कहते हैं कि “जाओ और बीरबल को बुला कर लेकर आओ अभी इसी वक्त।”

कुछ ही देर में बीरबल वहां उपस्थित हो जाते हैं और कहते हैं “जहाँ पनाह बताइए मुझे कैसे याद किया?”

अकबर बीरबल को पूरी बात बताते हैं और उन्हें यह भी बताते हैं कि हार खो जाने की वजह से रानी बहुत उदास है इसलिए आपको यह हार आज रात को ही ढूंढना होगा।

बीरबल राजा अकबर से कहते हैं “अच्छा तो यह मामला है यह बात तो पक्की है महाराज के चोर सिपाहियों या दासीयों मैं से ही कोई है। आज ही पता लगाने के लिए मुझे अपने एक दोस्त को  बुलाने जाना पड़ेगा ! अगर इजाजत हो तो मैं अपने दोस्त को बुलाने  जाऊ?”

बादशाह अकबर हैरान होकर पूछते हैं  “दोस्त कौन सा दोस्त? और आप क्यों जाना चाहते आप हमें बताइए, हम आपके दोस्त को यहीं बुला देते हैं।”

यह सुनकर बीरबल कहते हैं “नहीं नहीं जहांपनाह उसको बुलाने तो सिर्फ मुझे ही जाना पड़ेगा। वह मेरा दोस्त है कोई ऐसा वैसा दोस्त नहीं है, उसके बाद जादुई शक्तियां है जो चोर को पकड़ने में हमारी बहुत मदद करेगी  ! इसलिए मैं उसको लेकर आता हूं।”

यह सुन के राजा अकबर कहते हैं  “तो ठीक है तो जाइए बीरबल हम भी आपके दोस्त से मिलने के लिए बेसब्री से इंतजार करेंगे।”

बीरबल – “जहाँ पनाह आप बस महारानी जी के कमरे में पहरा देने वाले सभी सिपाही और दासियों को बुलबाइये, मैं अपने दोस्त को लेकर आता हूँ।”

तभी थोड़ी देर में बीरबल एक गधे को लेकर महल में वापस आते हैं।

अकबर बीरबल को गधे के साथ देख कर गुस्सा हो जाते हैं और कहते हैं “यह क्या मजाक है ? बीरबल तुमने तो कहा था तुम अपना दोस्त लेकर आओगे लेकिन यह तो एक गधा है।”

ऐसा सुनते बीरबल कहता है,  “जी महाराज यही मेरा दोस्त है और इसमें काफी सारी जादुई शक्तियां है यही जादुई शक्ति से हमारी चोर को पकड़ने में मदद भी करेगा।”

अकबर बहुत हैरानी से पूछते हैं “यह कैसे तुम्हारी मदद करेगा ! यह कैसे बताएगा कि चोर कौन है?”

बीरबल एक तंबू के अंदर गधे को खड़ा कर देते हैं और महाराज को कहते हैं “महाराज आप एक तंबू के अंदर  एक-एक करके सिपाही और दासियो को भेजिए,और इन सबको गधे की पूंछ पकड़ कर ये बोलना होगा कि मैंने चोरी नहीं की है। जब यह सारे लोग गधे की पूंछ पकड़कर ऐसा बोल देंगे तभी मेरा दोस्त बता पाएगा कि चोर कौन है।

अकबर हैरान होकर कहते हैं “ठीक है, सिपाही और दासियो आप सभी लोग एक-एक कर गधे की पूंछ पकड़िए,  जैसा बीरबल ने कहा है करिए।”

और फिर सभी सिपाही और दासी गधे की पूंछ पकड़ते हैं।

इसके बाद बीरबल, बादशाह अकबर से कहते हैं “ठीक है अब मैं जाता हूं और अपने दोस्त से पूछ कर आता हूं कि चोर कौन है?”

कुछ ही देर बाद बीरबल बाहर आते हैं और कहते हैं “महाराज हमें इन सब के हाथ सूंघने हैं और हाथ सूंघने के बाद बीरबल कहते हैं। यह सिपाही ही चोर है।”

यह सुन के सिपाही घबरा जाता है और कहता है “नहीं नहीं महाराज मैंने चोरी नहीं की इस गधे की गवाही यह साबित नहीं कर सकती है।”

बादशाह अकबर हैरान होकर पूछते हैं “बीरबल तुम यह कैसे कह सकते हो कि यही चोर है तुम गधे से बात कैसे कर सकते हो?”

बीरबल आपको समझाते हुए कहता है – “जहाँ पनाह मैंने उस गधे की पूंछ पर एक खास इत्र लगा दिया था। इसलिए मैंने इन सभी से गधे की पूंछ पकड़ने को कहा और जहाँ पनाह मैं ये भी जानता था कि चोर पकड़े जाने के डर से गधे की पूंछ नही पकड़ेगा। उस इत्र की खुशबू सभी के हाथों में से आ रही थी। लेकिन जब मैंने इसके हाथ सूंघे, तो इसके हाथों में वह खुसबू नही आ रही थी। इसलिए यही चोर है।”

बादशाह अकबर को पता लग गया था कि चोर कौन है इसलिए बादशाह अकबर भाइयों से कहकर उस चोर सिपाही को कालकोठरी में डलवा देते हैं और बीरबल को गले लगा लेते हैं।

बीरबल एक बार फिर आपने अपनी चतुराई से उस चोर को पकड़वा दिया, शुक्रिया बीरबल!क्या बेटा शुक्रिया।

बीरबल – शुक्रिया जहाँ पनाह!


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